विद्यापति के पद इतने कोमल -कान्त और भाव -प्रवण है की केवल मैथली भाषी ही नहीं ,अपितु बंग- भाषी और हिंदी भाषी भी उन्हें अपने साहित्य की अनुपम निधि समझते हैं :
मेरी स्वयं की रूचि ने मुझे इस संग्रह के लिए प्रेरित किया है , आपको अवश्य पसंद आएगी आपके बहुमुल्य सुझाव मेरे संग्रह को आपके लिए एवं मेरे लिए ज्यादा रुचिकर बना सकते है |
अभिनन्दन
अमित कुमार मिश्र
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें