जय जय भैरबी असुर -भयाउनी ,
पशुपति - भामिनी माया |
सहज सुमति बर दिअ हे गोसाउनी ,
अनुगति गति तूअ पाया || २ ||
कतओक दैत्य मारी मुह मेंलल ,
कतन उगिलि करू कूड़ा || ४ ||
सामर बरन , नयन अनुरंजित ,
जलद-जोग फूल कोका |
कट- कट विकट ओठ -पुट पँIडरी ,
लिधुर-फेन उठ फोका || ६ ||
घन घन घनन घुघुर कत बाजए,
हन हन कर तूअ काता |
विधापति कवी तूअ पद सेवक ,
पुत्र बिसरू जनि माता ; || ८ ||
नवोदित गायिका रजनी पल्लवी जी
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पशुपति - भामिनी माया |
सहज सुमति बर दिअ हे गोसाउनी ,
अनुगति गति तूअ पाया || २ ||
बासर - रैन सबासन सोभीत,
चरन, चन्द्रमनि चुडा |कतओक दैत्य मारी मुह मेंलल ,
कतन उगिलि करू कूड़ा || ४ ||
सामर बरन , नयन अनुरंजित ,
जलद-जोग फूल कोका |
कट- कट विकट ओठ -पुट पँIडरी ,
लिधुर-फेन उठ फोका || ६ ||
घन घन घनन घुघुर कत बाजए,
हन हन कर तूअ काता |
विधापति कवी तूअ पद सेवक ,
पुत्र बिसरू जनि माता ; || ८ ||
शब्दार्थ :- भैरवि = शंकर(महादेव) की पत्नी ,माता पार्वती | असुर = दैत्य , राक्षस | भयाउनी = भयप्रद |
पसुपति-भामिनी = पशुपतिनाथ ,महादेव की भार्या | सहज = सरलता से | बर = वरदान |
दीअ = दो | गोसाउनी=गोस्वामिनी , भगवती | अनुगति=अनुगामी , सेवक | गति=मोक्ष,आश्रम|
बासर-रैन = दिन-रात | सबासन = शवासन ,शव के आसन पर | सोभित = शोभित | चूड़ा = शिखा ,शिखर ,मस्तक | कतओक = कितने ही , बहुत से | मेलन = डाल लिया, रख लिया | कूड़ा = कुल्ला | सामर = श्यामल ,सावला | अनुरंजित = लाल | जलद-जोग = बादल से जुड़े हुए | कोका = कमल का फूल | ओठ-पुट = दोनों होंठ | पँIडरी = लाल रंग का पुष्प | लिधुर-फेन = रुधिर झाग | फोका = बुलबुले | घन- घन = गंभीर ,गहराकर | कत=कितने ही , अनेक | तुव=तुम्हारा | काता=कटार|
सन्दर्भ -- कविश्रेष्ठ इस पद में पशुपति-भामिनी भैरवी की वंदना कर यह बता दिया है की वो शिव शक्ति के उपासक थे |
विशेष :- कवि-विशेष ने जहां माँ-भगवती आराध्य की स्तुति करते हुए उनका शब्दों के माध्यम से विकराल चित्रण किया है ,वही दूसरी ओर देवी को माता कह कर देवी में वात्सल्य भावना को दर्शाया है |कवि ने कई साभिप्रायिक विशेषणों का व्यवहार किया है :-
"भैरबी असुर-भयाउनी "-विघ्नों को दूर करने वाली |
"पसुपति - भामिनी माया " माता रूप ,वात्सल्य भाव का घोतक |
"गोसाउनी " गो अर्थात इन्द्रियों पर स्वामित्व रखने वाली |(बुद्धि भी एक इन्द्रिय है )
"घन घन घनन घुघुर कत बाजय, हन-हन कर तुव काता " शत्रु -संहार करने वाली सत्वर गतिमयता सजीव एवं साकार हो गयी है |इस पद में ओजगुण विधान के साथ साथ वीभत्स की भी योजना की गयी है |
नवोदित गायिका रजनी पल्लवी जी
गायक श्री उदित नारायण झा के एवं
गायिका श्रीमती शारदा सिन्हा के मधुर शब्दों में .............
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