शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

devi vandana

जय जय भैरबी  असुर -भयाउनी , 
                   पशुपति - भामिनी माया |
सहज सुमति बर दिअ हे  गोसाउनी ,
                    अनुगति  गति तूअ  पाया  || २ ||
 बासर - रैन  सबासन  सोभीत,           
                   चरन, चन्द्रमनि  चुडा |
कतओक दैत्य मारी मुह मेंलल ,
                    कतन उगिलि करू कूड़ा      || ४  ||
सामर बरन , नयन अनुरंजित ,
                    जलद-जोग फूल कोका |
 कट- कट विकट ओठ -पुट पँIडरी ,
                     लिधुर-फेन उठ फोका        || ६  ||
 घन घन घनन घुघुर कत बाजए,
                     हन हन कर तूअ काता |
 विधापति कवी तूअ पद सेवक ,
                     पुत्र बिसरू जनि माता ;       || ८  ||

शब्दार्थ :- भैरवि = शंकर(महादेव) की पत्नी ,माता पार्वती |       असुर = दैत्य , राक्षस |  भयाउनी = भयप्रद  |
               पसुपति-भामिनी = पशुपतिनाथ ,महादेव की भार्या | सहज = सरलता से | बर = वरदान | 
               दीअ = दो | गोसाउनी=गोस्वामिनी , भगवती | अनुगति=अनुगामी , सेवक |                                             गति=मोक्ष,आश्रम|                     
बासर-रैन = दिन-रात | सबासन = शवासन ,शव के आसन पर | सोभित = शोभित | चूड़ा = शिखा ,शिखर ,मस्तक | कतओक = कितने ही , बहुत से | मेलन = डाल लिया, रख लिया | कूड़ा = कुल्ला | सामर = श्यामल ,सावला | अनुरंजित = लाल | जलद-जोग = बादल से जुड़े हुए | कोका = कमल का फूल | ओठ-पुट = दोनों होंठ | पँIडरी = लाल रंग का पुष्प | लिधुर-फेन = रुधिर झाग | फोका = बुलबुले | घन- घन = गंभीर ,गहराकर | कत=कितने ही , अनेक | तुव=तुम्हारा | काता=कटार|
 
सन्दर्भ -- कविश्रेष्ठ इस पद में पशुपति-भामिनी भैरवी की वंदना कर यह बता दिया है की वो शिव शक्ति के उपासक थे | 
विशेष :- कवि-विशेष ने जहां माँ-भगवती आराध्य की स्तुति करते हुए उनका शब्दों के माध्यम से विकराल चित्रण किया है ,वही दूसरी ओर देवी को माता कह कर देवी में  वात्सल्य भावना को दर्शाया है |कवि ने कई साभिप्रायिक विशेषणों का व्यवहार किया है :-
"भैरबी असुर-भयाउनी "-विघ्नों को दूर करने वाली |
"पसुपति - भामिनी माया " माता रूप ,वात्सल्य भाव का घोतक |
"गोसाउनी " गो अर्थात इन्द्रियों पर स्वामित्व रखने वाली |(बुद्धि भी एक इन्द्रिय है ) 
"घन घन घनन घुघुर कत बाजय, हन-हन कर तुव काता " शत्रु -संहार करने वाली सत्वर गतिमयता सजीव एवं साकार हो गयी है |इस पद में ओजगुण विधान के साथ साथ वीभत्स की भी योजना की गयी है |






नवोदित गायिका रजनी पल्लवी जी
गायक श्री उदित नारायण झा के एवं 
गायिका श्रीमती शारदा सिन्हा के मधुर शब्दों में .............

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